मासिक दुर्गाष्टमी 2025: व्रत, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत है। दुर्गाष्टमी पर भक्त व्रत रखते हैं और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं। मां दुर्गा की पूजा से भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है। इस व्रत का खास महत्व होता है। मासिक दुर्गाष्टमी व्रत करने से पारिवारिक जीवन में सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। मां दुर्गा की कृपा से भक्तों को करियर में तरक्की मिलती है और धन लाभ होता है। इस व्रत को करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यह एक शुभ अवसर है, जहाँ आप मां दुर्गा का आशीर्वाद पा सकते हैं।
मासिक दुर्गाष्टमी शुभ मुहूर्त
यह जानना महत्वपूर्ण है कि किस शुभ मुहूर्त में पूजा करनी चाहिए ताकि आपको अधिकतम लाभ मिल सके।
- ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 05:06 से सुबह 6:00
- प्रातः सन्ध्या – सुबह में 05:33 से 06:54
- अभिजित मुहूर्त – सुबह 11:48 से 12:30
- विजय मुहूर्त – दोपहर में 01:54 से 02:36
- गोधूलि मुहूर्त – शाम में 05:21 से 05:49
- सायाह्न सन्ध्या – शाम में 05:24 से 06:45
- अमृत काल – शाम 07:32 से रात 09:09
- निशिता मुहूर्त – रात 11:42 से सुबह 12:36
मासिक दुर्गाष्टमी पूजा विधि
मासिक दुर्गाष्टमी के दिन आप सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और इसके बाद साफ वस्त्र पहन लें। पूजा स्थल की सफाई करें और गंगाजल से शुद्ध करें। इसके बाद लकड़ी की चौकी लगाएं और लाल कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। मां दुर्गा को सोलह श्रृंगार, लाल फूल, फूलमाला, अक्षत, रोली, दीप, धूप आदि अर्पित करें। इसके बाद मां की आरती करें और भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करें। देवी मां को आप फल और मिठाई का भोग लगा सकते हैं। इस पूजा विधि का पालन करके आप मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram Lyrics in Hindi)
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥1॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥
कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥
अथ मन्त्रः
ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालयज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वलहं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥
इति मन्त्रः
नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे॥2॥
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥3॥
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥4॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥5॥
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥6॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं।
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥7॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥8॥
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है।
