2024 के चुनाव की तैयारी:राष्ट्रव्यापी हो रही तृणमूल, अभिषेक बिछा रहे हैं ‘राज्याभिषेक’ की बिसात; ममता ने अपने भतीजे को सौंपी अन्य राज्यों में सियासी कमान

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नई दिल्ली3 घंटे पहलेलेखक: मुकेश कौशिक

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पश्चिम बंगाल में भाजपा की आंधी रोककर ताकतवर हुई ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अब राष्ट्रव्यापी हो गई हैं। - Dainik Bhaskar

पश्चिम बंगाल में भाजपा की आंधी रोककर ताकतवर हुई ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अब राष्ट्रव्यापी हो गई हैं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की आंधी रोककर ताकतवर हुई ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अब राष्ट्रव्यापी हो गई हैं। दूसरे राज्यों में तृणमूल को ‘रोपने’ की कवायद शुरू हो गई है। पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने ‘राज्याभिषेक’ की ये कमान पर्दे की आड़ में चकाचौंध से दूर रहने वाले अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को सौंपी है। टीएमसी ने गोवा में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। इससे पहले ममता बनर्जी ने दिल्ली दौरे में सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं से मिलकर इरादे साफ कर दिए थे।

पार्टी के मुखपत्र जागो बांग्ला के 17 सितंबर के अंक में कांग्रेस को सड़ा हुआ बेमायने का तालाब करार देकर राहुल के बजाए ममता बनर्जी को असली विकल्प बताया था। बंगाल में जीत के बाद टीएमसी का राजनीतिक दांव था कि कांग्रेस को भाजपा से सीधे मुकाबले वाले राज्यों में लड़ने दिया जाए। लेकिन अब टीएमसी ने पैंतरा बदल दिया है। गोवा में चुनाव लड़ने की घोषणा कर टीएमसी देशभर में खुद को दमदार नेता वाली ‘असली कांग्रेस’ के तौर पर पेश करने के मूड में आ गई है।

शुरुआत ऐसे राज्यों से की जा रही है जहां कांग्रेस कमजोर हो गई है और भाजपा के लिए लोग मजबूत विकल्प नहीं तलाश पा रहे हैं। अभिषेक ने 2022 में त्रिपुरा और गोवा को टेस्ट केस के तौर पर लिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार इसके लिए संगठन में बदलाव और नए चेहरों को पार्टी में लाना है। प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति से अभिषेक की टीम राज्यों में विस्तार कर रही है।

सूत्र बताते हैं कि तृणमूल को राष्ट्रीय पटल पर ले जाने के पीछे अभिषेक की तमन्ना खुद बंगाल का मुख्यमंत्री बनने की है जो ममता बनर्जी के राष्ट्रीय नेता बनने से पूरी हो सकती है। इसी रणनीति में महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव को तृणमूल में लाकर राज्यसभा भेजना और बाबुल सुप्रियो को भाजपा से लाना है। तृणमूल बंगाल मॉडल का ‘नो वोट टू बीजेपी’ का नारा त्रिपुरा-गोवा भी ले जाएगी।

पार्टी के अनुसार बंगाल से बाहर गए बिना ममता की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। यही रणनीति आम आदमी पार्टी की भी है जो पंजाब में टक्कर देने के बाद गोवा में भी पांव पसार रही है। अब वहां टीएमसी से उसका पहली बार त्रिकाेणीय मुकाबला होने वाला है। इस तरह गोवा के चुनाव दोनों ही पार्टियों के लिए अहम हैं।

त्रिपुरा और गोवा में संभावनाएं तलाशती तृणमूल

सीएसडीएस के राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार के अनुसार त्रिपुरा में तृणमूल कांग्रेस के लिए भाषायी और परंपरागत वामपंथी वोट बैंक की जमीन तैयार है। बांग्ला भाषी क्षेत्रों में तृणमूल की पैठ आसान है। गोवा में चुनाव उम्मीदवार पर अधिक निर्भर करता है। टीएमसी युवा चेहरों और जिताऊ उम्मीदवारों पर दांव लगाना चाहेगी। पूर्व मुख्यमंत्री लुईजिनो फलेरो पुराने कांग्रेसी कैडर को तृणमूल से जोड़ना चाहेंगे।

टीएमसी ने प्रचार पर खर्च किए थे 154 करोड़ रुपए

पश्चिम बंगाल में इस साल हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने प्रचार अभियान पर 154.28 करोड़ रुपए खर्च किए थे। वहीं, तमिलनाडु में एआईएडीएमके को हराकर सत्ता पाने वाली डीएमके ने चुनाव प्रचार पर 114.14 करोड़ रुपए खर्च किए थे। यह जानकारी चुनाव आयोग की ओर से जारी राजनीतिक दलों के खर्च का ब्योरे से सामने आई है।

भाजपा ने खर्च की जानकारी नहीं दी। विधानसभा चुनावों से पहले तक सत्ता में रही एआईएडीएके ने तमिलनाडु और पड्डुचेरी में चुनावी प्रचार पर कुल 57.33 करोड़ रुपए खर्च किए थे। कांग्रेस ने असम, केरल, पुड्डुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 84.93 करोड़ रुपए, जबकि सीपीआई ने सबसे कम 13.19 करोड़ रुपए प्रचार अभियान में खर्च किए थे।

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