मां कामाख्या देवी:एकमात्र शक्तिपीठ जिसे महापीठ का दर्जा, यहां 9 नहीं 16 दिन का दुर्गा उत्सव, देवी की मूर्ति नहीं, कुंवारी कन्याओं की होती है पूजा

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गुवाहाटी4 घंटे पहलेलेखक: दिलीप कुमार शर्मा

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पौराणिक कथा है कि शिव सती के मृत शरीर को लेकर तीनों लोक में तांडव करने लगे तब विष्णु ने चक्र से सती के शव को काट दिया था। माता सती के योनि का भाग कामाख्या नामक स्थान पर गिरा था। - Dainik Bhaskar

पौराणिक कथा है कि शिव सती के मृत शरीर को लेकर तीनों लोक में तांडव करने लगे तब विष्णु ने चक्र से सती के शव को काट दिया था। माता सती के योनि का भाग कामाख्या नामक स्थान पर गिरा था।

नीलांचल की पहाड़ियों पर स्थित कामाख्या देवी मंदिर में दुर्गा पूजा उत्सव शुरू हो गया है। यहां महास्नान के साथ ही पंचगव्य के साथ देवता का अनुष्ठान होता है। भैंस, बकरी, कबूतर, मछली की बलि देने के साथ ही लौकी, कद्दू व गन्ने चढ़ाए जाते है। कामाख्या देवालय के धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष प्रबंधन कमेटी के प्रमुख मोहित चंद्र शर्मा बताते है, ‘कामाख्या में नवरात्रि से दुर्गा पूजा शुरू नहीं होती, बल्कि कृष्ण पक्ष की नवमी (इस बार 29 सितंबर) से शुरू होती है और समापन शुक्ल नवमी को होता है।

यानी यह उत्सव 16 दिन चलता है। पहले दिन से चंडी पाठ शुरू होता है। नवरात्रि से दुर्गा पूजा के साथ ही कुमारी पूजा शुरू होती है।’ कुमारी पूजा यहां की जाने वाली सभी प्रमुख पूजाओं का एक अभिन्न अंग है। कुमारी पूजा देवी काली द्वारा कोलासुर की हत्या की याद दिलाती है।

किंवदंती के अनुसार, कोलासुर ने स्वर्ग-पृथ्वी पर कब्जा कर लिया था। असहाय देवता की अपील पर मां काली ने फिर से जन्म लिया और एक युवती के रूप में कोलासुर का वध किया। इस पूजा में कुंवारी लड़की (कुमारी) को नई लाल साड़ी, माला, सिंदूर, आभूषण, इत्र आदि से खूबसूरती से सजाकर देवी कामाख्या के रूप में पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि कुमारी पूजा सभी खतरों को दूर करती है। इसका दार्शनिक आधार नारी के मूल्य की स्थापना करना है।

कामाख्या मंदिर का उल्लेख कालिका पुराण में मिलता है। 51 शक्तिपीठ में से सिर्फ कामाख्या को महापीठ का दर्जा हासिल है, लेकिन इस मंदिर में मां दुर्गा और मां जगदंबा की कोई मूर्ति नहीं है। भक्त मंदिर में बने एक कुंड पर फूल अर्पित कर पूजा करते हैं। इस कुंड को फूलों से ढककर रखा जाता है क्योंकि कुंड देवी सती की योनि का भाग है। इस कुंड से हमेशा पानी का रिसाव होते रहता है।

पूजा विधि की जानकारी देते हुए शर्मा कहते है, ‘कामाख्या मंदिर में हजारों साल पहले जिस विधि के तहत पूजा-अर्चना होती थी, आज भी उसी विधि के अनुसार पूजा की जाती है। यहां एक दिन भी पूजा बंद नहीं हुई। पुजारी ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर मंदिर में आते है और पूरी विधि के साथ पूजा करते है।’

मोहित चंद्र शर्मा का परिवार कन्नौज से आया था। वह बताते है, ‘कामाख्या मंदिर में पुजारियों का इतिहास एक हजार साल पुराना है। 10वीं सदी में राजा धर्मपाल ने मां की पूजा के लिए यूपी के कन्नौज से 5 पुजारी परिवार को यहां बसाया था। उसी समय से हमारा परिवार कामाख्या देवी की पूजा करते आ रहा है। इस समय चार परिवार बचे है जिनके परिवार के कुल पुरुष सदस्यों (वयस्क) की संख्या 465 है। एक पुजारी का परिवार अब नहीं है। यही लोग कामाख्या मंदिर के मूल पुजारी है। एक तय समय के बाद प्रत्येक परिवार के पुजारी की कामाख्या में पूजा करने की बारी आती है।’

सिर्फ वैक्सीन की दोनों डोज लेने वाले लोगों की ही गर्भगृह में प्रवेश

वैक्सीन की दोनों डोज लेने वाले भक्तों के लिए कामाख्या मंदिर के पट खोले गए हैं। जिन लोगों ने सिंगल डोज ली है, वे मंदिर में जा सकते हैै, लेकिन गर्भगृह में नहीं। पौराणिक कथा है कि शिव सती के मृत शरीर को लेकर तीनों लोक में तांडव करने लगे तब विष्णु ने चक्र से सती के शव को काट दिया था। माता सती के योनि का भाग कामाख्या नामक स्थान पर गिरा था।

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