कल खत्म हो सकता है किसान आंदोलन:आज होना था फैसला, पर केस वापसी पर पेंच फंसा; किसान सरकार से आश्वासन चाहते हैं

चंडीगढ़39 मिनट पहले

दिल्ली बॉर्डर पर चल रहा किसान आंदोलन कल यानी बुधवार को खत्म हो सकता है। सिंघु बॉर्डर पर मंगलवार को हुई संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक भी इसी मुद्दे पर हुई थी। अब केस वापसी को लेकर एक पेंच फंस गया है। सरकार का कहना है कि आंदोलन खत्म करने के बाद केस वापसी का ऐलान करेंगे। दूसरी ओर, किसान चाहते हैं कि सरकार अभी इस पर ठोस आश्वासन दे।

किसान नेता हरिंदर सिंह लक्खोवाल ने कहा कि किसान आंदोलन पर आज ही घोषणा की तैयारी थी, लेकिन सरकार ने बीच में पेंच फंसा दिया। अगर सरकार संशोधित प्रस्ताव भेजेगी तो आंदोलन पर फैसला हो जाएगा।

किन मुद्दों पर किसानों को सरकार के प्रस्ताव पर ऐतराज

केस वापसी: हरियाणा के 26 संगठनों ने कहा कि अगर बिना केस वापसी के किसान आंदोलन खत्म करने का ऐलान किया तो वे जाट आंदोलन की तरह फंस जाएंगे। जाट आंदोलन को भी सरकार ने इसी तरह खत्म कराया था, लेकिन किसान अभी भी केस भुगत रहे हैं। ऐसे में हरियाणा के किसान संगठन अभी केस वापसी पर ऐलान की मांग कर रहे हैं। पंजाब के 32 संगठन भी इस मांग में उनके साथ हैं।

किसान नेता अशोक धावले ने कहा कि केस वापस होने को लेकर किसानों में संदेह है। हमारा कहना है कि यह विश्वास की बात है। अकेले हरियाणा में 48 हजार किसानों पर केस दर्ज हैं। यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान और मध्यप्रदेश में केस दर्ज हैं। देश भर में रेलवे ने भी सैकड़ों केस दर्ज किए हैं। इसके लिए कोई समय-सीमा होनी चाहिए। इसके लिए सरकार तुरंत शुरुआत करे।

किसान नेता गुरनाम चढ़ूनी ने कहा कि केंद्र सरकार ने पहले आंदोलन खत्म करने की बात कही, लेकिन सरकार इसे टाइम बाउंड करे। किसानों को सरकार की नीयत पर शक न रहे। किसानों को संदेह है कि सरकार कहीं बात से बदल न जाए।

MSP: किसान नेता बलबीर राजेवाल ने कहा कि सरकार ने MSP के मामले में कमेटी की बात की है। जिसमें दूसरे संस्थानों, राज्य और अफसरों के साथ किसानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। हमें इस पर ऐतराज है। ऐसे लोग कमेटी में नहीं होने चाहिए, जो सरकार के साथ कानून बनाने में शामिल रहे।

अशोक धावले ने कहा कि MSP कमेटी में किसान संगठनों और संयुक्त किसान मोर्चा का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। एक साल से हमने आंदोलन लड़ा। जो किसान संगठन कृषि कानून के हक में थे, उन्हें भी कमेटी में रखा जा सकता है।

गुरनाम चढ़ूनी ने कहा कि MSP कमेटी को लेकर यह शक है कि कहीं सरकार कृषि कानून के समर्थन वालों को न रख ले। हम नहीं चाहते कि वे लोग इसमें शामिल हों। इसलिए सबकी राय है कि किसान प्रतिनिधि के तौर पर संयुक्त किसान मोर्चा से ही मेंबर लिए जाएं।

मुआवजा: किसान लीडर्स ने कहा कि इस पर सरकार ने सैद्धांतिक मंजूरी दी है, लेकिन हमारी मांग है कि केंद्र सरकार पंजाब मॉडल की तरह मुआवजे की मांग को माने, जिसमें 5 लाख का मुआवजा और एक सरकारी नौकरी का जिक्र है। इससे पीड़ित परिवारों को न्याय मिलेगा।

बिजली बिल और पराली: किसान नेताओं का कहना है कि यह बिल संसद में न लाया जाए। इससे किसानों की मुश्किल बढ़ेगी और उन्हें ज्यादा बिल देना पड़ेगा। पराली के बारे में सरकार ने कहा कि किसानों पर केस नहीं होगा। सरकार ने मार्च महीने में जरूर कुछ चीजें हटाईं, लेकिन उसमें एक सेक्शन डालने से फिर से किसानों को दिक्कत हो सकती है। किसान नेताओं ने इस सेक्शन को भी हटाने की मांग की है।

8 दिन लगेंगे घर वापसी में : टिकैत

किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार कह रही है कि केस हम वापस ले लेंगे, आप आंदोलन खत्म कर दो। इस तरह हम भरोसा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि किसानों के कई ट्रैक्टर दिल्ली के थानों में खड़े हैं। बाद में कौन वहां घुसेगा। इसलिए सरकार इस पर स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट करे। हमें यहां से वापस जाने में भी कम से कम 8 दिन का समय लगेगा।

क्या कल हो जाएगा आंदोलन पर फैसला?

किसान नेता बलवंत सिंह बहिरामके ने कहा है कि सरकार की ओर से जो ड्राफ्ट भेजा गया था, उसमें कुछ पॉइंट्स बहुत स्पष्ट नहीं थे। इस पर कई घंटे तक चर्चा हुई है। कुछ प्रस्तावों पर हमें केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण की जरूरत है। उन्हें सरकार को वापस भेजा जाएगा। हमें उम्मीद है कि कल हमें सरकार से जवाब मिल जाएगा। सरकार से जो भी ऑफर आएगा, उस पर चर्चा कर आगे की कार्रवाई होगी।

कैसे निकलेगा इसका रास्ता?

केस वापसी और मुआवजे के मुद्दे पर केंद्र से बातचीत के लिए संयुक्त किसान मोर्चा ने 5 मेंबर्स की कमेटी बनाई है। जिसमें पंजाब से बलबीर राजेवाल, उत्तर प्रदेश से युद्धवीर सिंह, मध्यप्रदेश से शिव कुमार कक्का, महाराष्ट्र से अशोक धावले और हरियाणा से गुरनाम चढ़ूनी शामिल हैं। इनकी गृह मंत्रालय के साथ अंतिम मीटिंग हो सकती है।

3 कृषि कानून वापसी के बाद आंदोलन खत्म करने का दबाव

केंद्र सरकार वह तीनों कृषि कानून वापस ले चुकी है, जिसकी वजह से यह आंदोलन शुरू हुआ था। जिस पर लोकसभा, राज्यसभा के बाद राष्ट्रपति की मुहर लग चुकी है। इसके बाद से ही दिल्ली बॉर्डर से किसान वापस लौटना शुरू कर चुके थे। किसान संगठनों पर भी दबाव बन गया था कि वह आंदोलन खत्म करें।

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